
ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों और अमेरिका की संभावित सैन्य कार्रवाई की चर्चाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि मौजूदा हालात में दुनिया के बड़े देश किस पाले में खड़े हैं और कौन संतुलन बनाए रखना चाहता है। कोई खुलकर अमेरिका के साथ दिख रहा है, कोई ईरान का कूटनीतिक समर्थन कर रहा है और कई देश ऐसे हैं जो टकराव से दूरी बनाकर अपने राष्ट्रीय हित बचाने की कोशिश में हैं। इसी संदर्भ में भारत की भूमिका भी अहम हो जाती है, जो पश्चिमी देशों और ईरान दोनों के साथ अपने रिश्तों को संतुलित रखने की नीति पर चलता आया है।
अमेरिका ईरान में हो रहे व्यापक विरोध-आंदोलन के बीच शक्ति प्रदर्शन कर रहा है और सैन्य कार्रवाई के विकल्प पर विचार कर रहा है। यह रुख़ अमेरिका और उसके प्रमुख सहयोगियों जैसे इज़राइल के साझा हितों से जुड़ा है, क्योंकि दोनों देश ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मिडिल ईस्ट में उसके प्रभाव को सीमित करना चाहते हैं। इस दौरान कई पश्चिमी शक्तियों ने यह भी कहा है कि सैन्य हमले के बजाय कूटनीतिक समाधान प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन अमेरिका का रुख़ यह दिखाता है कि वह ईरान को राजनीतिक रूप से अलग-थलग करना चाहता है।
रूस, चीन और ईरान के पारंपरिक साझेदार
रूस और चीन ईरान के प्रति ज़ुबानी समर्थन जताते रहे हैं और अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप का विरोध कर रहे हैं। दोनों देशों के लिए ईरान एक भू-राजनीतिक साझेदार है, जिससे पश्चिमी दबाव के खिलाफ संतुलन बनता है। हालांकि इनका समर्थन सीमित है और वे सीधे सैन्य टकराव में नहीं उतरने का संकेत दे रहे हैं, फिर भी कूटनीतिक स्तर पर वे ईरान का साथ दे रहे हैं।
तुर्की और क्षेत्रीय प्रतिक्रिया: हस्तक्षेप के खिलाफ पर डिस्टेंस
तुर्की ने साफ़ किया है कि वह ईरान में सैन्य हस्तक्षेप का विरोध करता है और स्थिरता को प्राथमिकता देता है। उसकी इस नीति से यह स्पष्ट होता है कि वह किसी बड़े संघर्ष में शामिल नहीं होना चाहता, भले ही अमेरिका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बना रहा हो। इसके अलावा सऊदी अरब और कुछ अरब देशों ने भी स्पष्ट समर्थन या सैन्य साथ नहीं दिया है, क्यों कि उनका ध्यान इस संघर्ष को अपनी सीमाओं तक फैलने से रोकने पर ज़्यादा है।
पाकिस्तान और मुस्लिम दुनिया का मिश्रित रुख़
कई मुस्लिम-बहुल देशों ने क्षेत्रीय संघर्षों को कूटनीतिक हल के माध्यम से सुलझाने और किसी भी बड़े युद्ध से बचने का आह्वान किया है। पाकिस्तान ने भी तनाव को बढ़ने से रोकने पर ज़ोर दिया है और सीधे किसी पक्ष के साथ नहीं खड़ा होने की रणनीति अपनाई है। वहीं कुछ समुदायों और धार्मिक नेताओं ने भारत जैसे देशों को ईरान के पक्ष में खड़े होने के लिए भी कहा है, लेकिन यह आधिकारिक राज्य नीति नहीं है।
भारत का स्थान: संतुलन और राष्ट्रीय हितों की चुनौतियाँ
भारत इस संकट में स्पष्ट सैन्य पक्ष नहीं ले रहा है और आमतौर पर कूटनीतिक समाधान और शांति पर ज़ोर दे रहा है। भारत और ईरान के बीच ऐतिहासिक आर्थिक और भूराजनीतिक रिश्ते हैं, जैसे चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट आदि, लेकिन अमेरिकी दबाव और प्रतिबंधों के कारण भारत को संतुलित नीति अपनानी पड़ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत को अपनी राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक स्वायत्तता को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना होगा, क्योंकि ईरान जैसे रणनीतिक साझेदार से अलग होने से भारत के व्यापक क्षेत्रीय हितों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।




