
दुनिया के बदलते आर्थिक और भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता निर्णायक दौर में पहुंच गया है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दावोस शिखर सम्मेलन में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इस समझौते को लेकर बड़े संकेत दिए। उन्होंने कहा कि भारत-ईयू व्यापार समझौता इतना व्यापक है कि कुछ लोग इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कह रहे हैं। इस समझौते से करीब 2 अरब लोगों का साझा बाजार बनेगा और यह वैश्विक GDP के लगभग एक चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करेगा। दावोस में दिए गए इस बयान को इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि अगले ही सप्ताह उर्सुला वॉन डेर लेयेन भारत के दौरे पर आने वाली हैं। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब भारत और 27 देशों के यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत अंतिम चरण में पहुंच चुकी है और 27 जनवरी को भारत-ईयू शिखर सम्मेलन में बड़ी घोषणा की संभावना जताई जा रही है।
क्यों ऐतिहासिक माना जा रहा है भारत-ईयू समझौता
यह प्रस्तावित व्यापार समझौता केवल टैरिफ घटाने तक सीमित नहीं है। इसका दायरा वस्तुओं, सेवाओं, निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्वच्छ ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल्स और उन्नत विनिर्माण तक फैला हुआ है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, जबकि यूरोपीय संघ वैश्विक व्यापार का एक प्रमुख केंद्र है। दोनों को जोड़ने वाली यह डील ऐसे समय सामने आ रही है, जब दुनिया भर की सरकारें सप्लाई-चेन निर्भरता पर दोबारा विचार कर रही हैं। यूरोपीय संघ के लिए भारत, चीन पर बढ़ती निर्भरता को कम करने और भरोसेमंद साझेदारों के साथ व्यापार बढ़ाने की रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है। वहीं भारत के लिए 27 देशों के इस बड़े बाजार तक गहरी पहुंच निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और वैश्विक मूल्य श्रृंखला में ऊपर उठने का अवसर देगी।
2007 से अब तक का लंबा सफर
भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत की शुरुआत वर्ष 2007 में हुई थी। शुरुआती वर्षों में कई दौर की वार्ता हुई, लेकिन नियामकीय मतभेद, टैरिफ और बाजार पहुंच जैसे मुद्दों पर सहमति न बनने के कारण यह प्रक्रिया करीब एक दशक तक ठप रही। वर्ष 2022 में बातचीत को फिर से रफ्तार मिली। इस बार बातचीत का स्वरूप पहले से कहीं अधिक आधुनिक रखा गया, जिसमें केवल सीमा शुल्क नहीं बल्कि डिजिटल गवर्नेंस, उभरती तकनीकें और सप्लाई-चेन लचीलापन जैसे विषय भी शामिल किए गए। इसी दौरान भारत और यूरोपीय संघ के बीच ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल की शुरुआत हुई, जिसने संवेदनशील तकनीकी और नियामकीय मसलों पर भरोसा बढ़ाने का काम किया। इससे बातचीत को नई दिशा मिली और समझौते को व्यापक रूप देने में मदद मिली।
जनसंख्या और बाजार की ताकत
इस समझौते की सबसे बड़ी खासियत इसका विशाल उपभोक्ता आधार है। भारत और यूरोपीय संघ की संयुक्त जनसंख्या करीब 2 अरब के आसपास है। यही वजह है कि इसे दुनिया के सबसे बड़े संभावित बाजारों में से एक माना जा रहा है। इतना बड़ा उपभोक्ता आधार वैश्विक कंपनियों, निवेशकों और विनिर्माण क्षेत्रों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है। यही कारण है कि इसे वैश्विक GDP के लगभग एक चौथाई हिस्से को प्रभावित करने वाला समझौता बताया जा रहा है।
व्यापार के आंकड़े और बढ़ती मजबूरी
भारत और यूरोपीय संघ के बीच द्विपक्षीय व्यापार पहले ही रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। वर्ष 2023 में वस्तुओं का व्यापार करीब 124 अरब यूरो तक पहुंचा, जबकि डिजिटल और आईटी सेवाओं के नेतृत्व में सेवाओं का व्यापार लगभग 60 अरब यूरो आंका गया। विशेषज्ञों का मानना है कि औपचारिक मुक्त व्यापार समझौता इन आंकड़ों को कई गुना बढ़ा सकता है, खासकर स्वच्छ ऊर्जा, डिजिटल सेवाओं और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में।
अब भी बाकी हैं कई अड़चनें
दावोस में दिखी सकारात्मकता के बावजूद कई मुद्दे अब भी चुनौती बने हुए हैं। यूरोपीय संघ भारत से ऑटोमोबाइल, वाइन और स्पिरिट्स पर गहरी टैरिफ कटौती चाहता है, जबकि भारत इन क्षेत्रों को घरेलू उद्योगों की सुरक्षा के लिए संवेदनशील मानता है। दूसरी ओर भारत कुशल पेशेवरों की आवाजाही के लिए अधिक अनुकूल नियम चाहता है, लेकिन वीजा और श्रम गतिशीलता यूरोपीय देशों में राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषय हैं। इसके अलावा स्थिरता मानक, सार्वजनिक खरीद और नियामकीय सामंजस्य जैसे मुद्दों पर भी अंतिम सहमति बाकी है।
गणतंत्र दिवस, रक्षा और जियोपॉलिटिक्स
इस बार यूरोपीय संघ की लीडरशिप भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हो रही है। 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस परेड में यूरोपीय संघ के देशों का एक सैन्य दस्ता भी हिस्सा लेगा, जो अपने आप में ऐतिहासिक माना जा रहा है। इसके साथ ही 27 जनवरी को होने वाले भारत-ईयू शिखर सम्मेलन में व्यापार के साथ-साथ रक्षा और सुरक्षा सहयोग पर भी चर्चा होने की संभावना है। बदलते वैश्विक जियोपॉलिटिक्स के बीच यह साझेदारी अमेरिका और चीन जैसी बड़ी शक्तियों के प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।
आगे क्या संकेत
उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा की भारत यात्रा को निर्णायक माना जा रहा है। राजनयिकों के अनुसार, यह दौरा राजनीतिक स्तर पर अटके मुद्दों को सुलझाने का मौका दे सकता है। अगर यह समझौता अंतिम रूप ले लेता है तो यह न केवल भारत और यूरोपीय संघ के रिश्तों को नई ऊंचाई देगा, बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था में भी एक बड़ा बदलाव लेकर आएगा।




