
कल्पना कीजिए कि आप रात के अंधेरे में आसमान को देख रहे हैं। आपको तारे दिखते हैं, आकाशगंगाएं दिखती हैं, चमकता हुआ ब्रह्माण्ड दिखता है। अब ज़रा यह सोचिए कि उसी विशाल ब्रह्माण्ड में कुछ ऐसा भी हो सकता है जो मौजूद तो है, बहुत बड़ा है, भारी है, लेकिन लगभग पूरी तरह अदृश्य है। न उसमें तारे हैं, न रोशनी, न कोई चमक। फिर भी वह असली है। यही कहानी है ‘Cloud-9’ की। NASA और ESA की साझेदारी से चलने वाली Hubble Space Telescope ने हाल ही में एक ऐसे खगोलीय पिंड की पुष्टि की है जो हमारी अब तक की ब्रह्माण्ड की समझ को थोड़ा और गहरा कर देता है। इसका नाम रखा गया है Cloud-9। यह कोई तारा नहीं है, कोई ग्रह नहीं है, और न ही यह वैसी आकाशगंगा है जैसी हम आमतौर पर जानते हैं। वैज्ञानिक इसे एक “असफल आकाशगंगा” कहते हैं, यानी ऐसा ढांचा जो आकाशगंगा बनने की प्रक्रिया में आगे नहीं बढ़ पाया।
साधारण शब्दों में कहें तो आकाशगंगा बनने की कहानी कुछ यूं होती है। ब्रह्माण्ड में गैस इकट्ठा होती है, डार्क मैटर उसका ढांचा बनाता है, गुरुत्वाकर्षण गैस को दबाता है और फिर तारे जन्म लेते हैं। तारे जलते हैं, रोशनी फैलती है, और हमें एक चमकती हुई आकाशगंगा दिखाई देती है। लेकिन Cloud-9 इस कहानी का अधूरा अध्याय है। यहां गैस तो है, डार्क मैटर भी है, गुरुत्वाकर्षण भी है, लेकिन तारे कभी पैदा ही नहीं हुए।
Cloud-9 हमसे लगभग 14 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर स्थित है। यह दूरी इतनी ज़्यादा है कि इसकी रोशनी अगर होती भी, तो उसे हम तक पहुंचने में करोड़ों साल लगते। लेकिन असल बात यह है कि इसमें रोशनी पैदा करने वाले तारे ही नहीं हैं। इसमें मुख्य रूप से न्यूट्रल हाइड्रोजन गैस मौजूद है। यही वह कच्चा माल होता है जिससे आमतौर पर तारे बनते हैं। फिर सवाल उठता है कि जब सामग्री मौजूद थी, तो तारे क्यों नहीं बने। इसका जवाब हमें ब्रह्माण्ड के शुरुआती दौर में ले जाता है। जब ब्रह्माण्ड बहुत युवा था, तब एक चरण आया जिसे “रीआयोनाइज़ेशन” कहा जाता है। उस समय पहली पीढ़ी के तारों और आकाशगंगाओं से इतनी ऊर्जा निकली कि आसपास की गैस गर्म हो गई। कई छोटे गैस क्लाउड उस गर्मी को सहन नहीं कर पाए। उनकी गैस तारे बनाने के लिए पर्याप्त ठंडी और सघन नहीं हो सकी। Cloud-9 शायद उन्हीं में से एक है, एक ऐसा ढांचा जो समय की उस कसौटी पर रुक गया।
आकार की बात करें तो Cloud-9 छोटा नहीं है। इसके केंद्र का फैलाव लगभग 4,900 प्रकाश वर्ष तक है। इसमें मौजूद हाइड्रोजन गैस का द्रव्यमान हमारे सूर्य के द्रव्यमान से करीब दस लाख गुना अधिक है। लेकिन इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इसके चारों ओर डार्क मैटर का एक विशाल घेरा है, जिसका द्रव्यमान लगभग पांच अरब सूर्यों के बराबर आंका गया है। यानी जो चीज़ हम देख नहीं सकते, वही इस पूरे ढांचे को थामे हुए है।
इस खोज की पुष्टि आसान नहीं थी। सबसे पहले Cloud-9 का संकेत रेडियो तरंगों में मिला, क्योंकि हाइड्रोजन गैस रेडियो तरंगों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराती है। लेकिन रेडियो संकेत यह नहीं बताते कि वहां तारे हैं या नहीं। इसके लिए ज़रूरत थी बहुत संवेदनशील आंखों की। Hubble ने उसी इलाके की गहराई से तस्वीरें लीं और साफ कर दिया कि वहां कोई भी तारा नहीं है। जो चमकती बिंदुएं दिखीं, वे दरअसल बहुत पीछे की दूसरी आकाशगंगाएं थीं। यह खोज इसलिए भी अहम है क्योंकि यह हमारे सैद्धांतिक मॉडल को असल दुनिया में साबित करती है। लंबे समय से वैज्ञानिक कहते रहे हैं कि ब्रह्माण्ड में ऐसे डार्क मैटर प्रधान ढांचे होने चाहिए जिनमें तारे न हों। Cloud-9 पहला ऐसा ठोस उदाहरण है जिसे सीधे देखा और परखा जा सका। यह हमें याद दिलाता है कि ब्रह्माण्ड सिर्फ वही नहीं है जो चमकता है। असली कहानी अक्सर अंधेरे में छुपी होती है।
इसका मतलब यह है कि ब्रह्माण्ड एक अधूरी किताब की तरह है। कुछ पन्ने रोशनी से भरे हैं, जिन्हें हम आसानी से पढ़ लेते हैं। लेकिन कुछ पन्ने ऐसे हैं जिन पर स्याही तो है, पर रोशनी नहीं। Cloud-9 जैसे पिंड हमें उन पन्नों को छूने का मौका देते हैं। वे बताते हैं कि सृष्टि सिर्फ तारों की कहानी नहीं है, बल्कि उन चीज़ों की भी है जिन्हें हम देख नहीं सकते, लेकिन जो सब कुछ थामे हुए हैं।




