स्लीप सिग्नल्स से 130 बीमारियों का रिस्क बताता है यह एआई

Stanford Medicine के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम बनाया है, जो सिर्फ एक रात की नींद के आंकड़ों को देखकर यह अंदाजा लगा सकता है कि किसी व्यक्ति को आगे चलकर गंभीर बीमारियों का खतरा कितना है। दिल की बीमारी, मानसिक रोग, कैंसर, यहां तक कि पार्किंसन और डिमेंशिया जैसी बीमारियां भी।

यह सुनने में किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसा लगता है, लेकिन इसके पीछे की सोच बहुत गहरी और बहुत मानवीय है। हम सबने कभी न कभी खराब नींद का अनुभव किया है। अगली सुबह भारी सिर, थका हुआ शरीर, चिड़चिड़ापन। आम तौर पर हम इसे एक खराब रात मानकर भूल जाते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों ने सोचा, अगर यह खराब रात सिर्फ आज की थकान की कहानी नहीं, बल्कि आने वाले सालों की चेतावनी हो तो।

इसी सवाल से जन्म हुआ SleepFM नाम के इस एआई मॉडल का। इस सिस्टम को सिखाया गया लगभग छह लाख घंटों की नींद। करीब पैंसठ हजार लोगों की नींद, जिन्हें अस्पतालों में एक खास जांच के दौरान रिकॉर्ड किया गया। इस जांच को पॉलीसोम्नोग्राफी कहा जाता है। इसमें व्यक्ति के सोते समय दिमाग की तरंगें, दिल की धड़कन, सांसों की गति, आंखों की हरकत, पैरों की हलचल, और शरीर के कई संकेत एक साथ दर्ज किए जाते हैं।

अब कल्पना कीजिए, एक इंसान आठ घंटे तक सो रहा है, और उसके शरीर की हर छोटी बड़ी गतिविधि रिकॉर्ड हो रही है। यह जैसे शरीर की आत्मकथा हो, बिना शब्दों के। समस्या यह थी कि इतने वर्षों तक डॉक्टर इस डेटा का बहुत छोटा हिस्सा ही देखते थे। मुख्य रूप से यह जांचने के लिए कि व्यक्ति को स्लीप एपनिया है या नहीं, या नींद के चरण ठीक हैं या नहीं। बाकी जानकारी मानो फाइलों में दबी रह जाती थी। लेकिन एआई की खासियत यही है। वह वहां भी पैटर्न देख लेता है, जहां इंसानी आंखें सिर्फ शोर देखती हैं।

SleepFM को इस तरह बनाया गया कि वह नींद को एक भाषा की तरह समझ सके। जैसे हम शब्दों से वाक्य बनाते हैं, वैसे ही यह एआई पांच सेकंड के छोटे छोटे नींद के टुकड़ों से पूरी रात की कहानी जोड़ता है। दिमाग की तरंगें, दिल की लय, मांसपेशियों की हलचल, सांस की आवाजें, सब मिलकर एक छुपा हुआ अर्थ बनाती हैं। वैज्ञानिकों ने इसे इस तरह ट्रेन किया कि अगर किसी एक संकेत को हटा दिया जाए, तो भी यह बाकी संकेतों से अंदाजा लगा सके कि वहां क्या होना चाहिए था। जैसे कोई संगीत सुनकर समझ ले कि अगर एक वाद्य बंद हो जाए, तो भी धुन कैसी होगी।

जब इस एआई को परखा गया, तो यह सामान्य नींद की जांचों में भी मौजूदा सिस्टम्स से बेहतर निकला। लेकिन असली हैरानी तब हुई, जब इसे भविष्य की बीमारियों की भविष्यवाणी के लिए इस्तेमाल किया गया। स्टैनफोर्ड के स्लीप मेडिसिन सेंटर के पास दशकों का मेडिकल डेटा मौजूद था। कुछ मरीजों की नींद की जांच और उसके बाद पच्चीस साल तक का स्वास्थ्य रिकॉर्ड। यानी यह देखा जा सकता था कि जो व्यक्ति आज सोते समय जैसा था, वह दस या बीस साल बाद किस बीमारी से जूझा।

इस मिलान के बाद SleepFM ने एक हजार से ज्यादा बीमारियों में से करीब एक सौ तीस ऐसी स्थितियां पहचानी, जिनका खतरा सिर्फ नींद से अंदाजा लगाया जा सकता था। कैंसर, गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताएं, दिल की बीमारियां, मानसिक रोग, इन सब में इसका अनुमान काफी मजबूत निकला। यह अनुमान C index नाम के एक पैमाने से मापा गया। साधारण भाषा में, यह देखता है कि एआई कितनी बार सही व्यक्ति को ज्यादा खतरे वाला बताता है। कई बीमारियों में यह सटीकता अस्सी प्रतिशत से भी ज्यादा थी। पार्किंसन और कुछ कैंसर मामलों में तो यह और भी ऊंची रही।

सबसे दिलचस्प बात यह नहीं कि एआई भविष्य बता सकता है। बल्कि यह कि वह कैसे बताता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि असली संकेत तब मिलते हैं, जब शरीर के अलग अलग हिस्से आपस में तालमेल खो देते हैं। जैसे दिमाग पूरी तरह सोया हुआ दिखे, लेकिन दिल की धड़कन जागने जैसी हो। या सांसें किसी और लय में चल रही हों। यह असंतुलन, यह हल्की सी असंगति, आने वाली बीमारी की फुसफुसाहट हो सकती है। यह खोज हमें एक गहरी सच्चाई की ओर ले जाती है। हमारा शरीर एक ऑर्केस्ट्रा की तरह है। जब सारे वाद्य एक साथ सही लय में बजते हैं, तो हम स्वस्थ रहते हैं। जब कोई वाद्य अपनी ही धुन पकड़ लेता है, तो संगीत बिगड़ने लगता है।

SleepFM अभी डॉक्टर नहीं है। यह इलाज नहीं करता। यह बस उस भाषा को सुनता है जो हमारा शरीर हर रात बोलता है, जब हम खुद अनजान होते हैं। आने वाले समय में, अगर इसे पहनने वाले उपकरणों से जोड़ा गया, तो हो सकता है कि आपकी घड़ी या बैंड सिर्फ कदम न गिने, बल्कि यह भी बताए कि आपका शरीर भीतर से किस दिशा में जा रहा है। नींद तब सिर्फ आराम नहीं रहेगी। वह भविष्य की एक खिड़की बन जाएगी।

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न्यूज़ डेस्क

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