
साल 2026 के बाद देश की राजनीति में बड़ा भूचाल आ सकता है। लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण यानी डिलिमिटेशन का मुद्दा अब सिर्फ संवैधानिक बहस नहीं रहा बल्कि सीधा सत्ता और प्रतिनिधित्व की लड़ाई बन चुका है। संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 के अनुसार हर जनगणना के बाद लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव किया जा सकता है। लेकिन 1976 से इस प्रक्रिया को रोक दिया गया था और बाद में इसे 2026 तक बढ़ा दिया गया।
अब इसी मुद्दे से महिला आरक्षण भी जुड़ गया है और राजनीति और ज्यादा गर्म हो गई है। 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का रास्ता साफ किया गया था। लेकिन इसकी सबसे बड़ी शर्त यह थी कि पहले नई जनगणना होगी फिर डिलिमिटेशन होगा और उसके बाद ही महिला आरक्षण लागू होगा। यही वजह है कि महिलाओं के लिए आरक्षण का वादा होने के बावजूद उसका लाभ अभी तक जमीन पर नहीं दिखा।
हाल ही में केंद्र सरकार ने इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए संविधान का 131वां संशोधन विधेयक 2026 पेश किया। इसके तहत लोकसभा की कुल सीटों को 543 से बढ़ाकर लगभग 850 तक ले जाने और एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव रखा गया। सरकार का तर्क था कि इससे 2029 के चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू किया जा सकेगा और प्रतिनिधित्व भी बेहतर होगा।
लेकिन विपक्ष ने इसे सिर्फ महिला आरक्षण नहीं बल्कि डिलिमिटेशन की राजनीति बताया। कई विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि महिला आरक्षण के नाम पर राज्यों की राजनीतिक ताकत बदलने की कोशिश हो रही है। खासकर दक्षिण भारत के राज्यों को डर है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के बावजूद उनकी लोकसभा सीटों का प्रभाव कम हो सकता है जबकि उत्तर भारत के बड़े राज्यों को ज्यादा फायदा मिलेगा। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इसे लेकर खुलकर विरोध जताया और कहा कि महिला आरक्षण को डिलिमिटेशन से अलग रखा जाना चाहिए।
लोकसभा में यह विधेयक जरूरी दो तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका। 298 सांसदों ने समर्थन किया जबकि 230 ने विरोध में मतदान किया और बिल गिर गया। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिलाओं से माफी मांगते हुए कहा कि सरकार महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिए हर बाधा दूर करेगी। विपक्ष ने जवाब दिया कि उनकी लड़ाई महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं बल्कि डिलिमिटेशन के जरिए राजनीतिक संतुलन बदलने के खिलाफ है।
यही वजह है कि 2026 का डिलिमिटेशन अब सिर्फ सीटों का गणित नहीं रहा। यह महिलाओं के प्रतिनिधित्व उत्तर और दक्षिण भारत के शक्ति संतुलन और आने वाले 2029 के चुनाव की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। आने वाले महीनों में यह तय करेगा कि संसद में किसकी आवाज ज्यादा मजबूत होगी और भारत का लोकतंत्र किस दिशा में आगे बढ़ेगा।




