
हमें लगता है कि परमाणु बम से बड़ी कोई शक्ति नहीं हो सकती, लेकिन ब्रह्मांड हमें बार बार यह याद दिलाता है कि हमारी सोच कितनी सीमित है। हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी ही घटना देखी है, जो हर सेकंड लगभग दस क्विंटिलियन (एक करोड़ खरब) हाइड्रोजन बम के बराबर ऊर्जा बाहर फेंक रही है। यह कोई विस्फोट नहीं जो एक पल में खत्म हो जाए, बल्कि एक लगातार चलने वाली ब्रह्मांडीय प्रक्रिया है।
यह अद्भुत घटना एक नजदीकी आकाशगंगा में देखी गई है, जिसका नाम VV 340a है। यह आकाशगंगा देखने में भले ही शांत और साधारण लगे, लेकिन इसके भीतर एक ऐसी शक्ति काम कर रही है जो पूरी आकाशगंगा की किस्मत बदल सकती है। इस खोज में इंसानों की आंखों का विस्तार बना है James Webb Space Telescope, जो हमें वह सब दिखा रहा है जो पहले धूल और अंधेरे में छिपा हुआ था।
VV 340a के केंद्र में एक विशाल ब्लैक होल मौजूद है। ब्लैक होल को अक्सर हम एक ऐसे दैत्य के रूप में सोचते हैं जो सब कुछ निगल जाता है, लेकिन असलियत इससे कहीं ज्यादा रोचक है। जब गैस और धूल ब्लैक होल के पास पहुंचती है, तो वह सीधे अंदर नहीं गिरती। वह पहले एक चक्करदार चक्र में घूमती है, गर्म होती है, चमकती है और फिर कुछ हिस्सा अंदर गिर जाता है, जबकि कुछ हिस्सा बेहद तेज गति से बाहर फेंक दिया जाता है। यही बाहर फेंका गया पदार्थ जेट्स कहलाता है।
इन जेट्स की ताकत को समझने के लिए तुलना जरूरी है। वैज्ञानिकों के अनुसार VV 340a से निकलने वाली ऊर्जा हर सेकंड इतनी है जैसे एक साथ दस क्विंटिलियन हाइड्रोजन बम फट रहे हों। यह संख्या इतनी बड़ी है कि दिमाग उसे पकड़ ही नहीं पाता। इसका मतलब यह नहीं कि वहां लगातार विस्फोट हो रहे हैं, बल्कि यह ऊर्जा का एक निरंतर प्रवाह है, जैसे किसी अदृश्य इंजन ने ब्रह्मांड के बीचोंबीच खुद को चालू रखा हो।
James Webb टेलीस्कोप की खासियत इसकी इन्फ्रारेड दृष्टि है। आम टेलीस्कोप दृश्यमान रोशनी देखते हैं, लेकिन ब्रह्मांड में बहुत सी जगहें धूल से भरी होती हैं, जो उस रोशनी को रोक देती हैं। इन्फ्रारेड रोशनी उस धूल को पार कर जाती है। VV 340a में भी यही हुआ। जहां पहले कुछ दिखाई नहीं देता था, वहां Webb ने बेहद गर्म गैस के विशाल बादल साफ साफ दिखा दिए। ये बादल आकाशगंगा के दोनों ओर फैले हुए हैं और उनकी लंबाई इतनी है कि वे पूरी आकाशगंगा के बराबर या उससे भी ज्यादा हैं।
ये गैस के बादल किसी साधारण धुएं की तरह नहीं हैं। यह गैस इतनी गर्म है कि इसके परमाणु टूट चुके हैं और वह अत्यधिक आयनित अवस्था में है। इसे वैज्ञानिक कोरोनल गैस कहते हैं। आमतौर पर ऐसी गैस ब्लैक होल के बहुत पास ही सीमित रहती है, लेकिन यहां यह हजारों प्रकाश वर्ष दूर तक फैल रही है। यह ऐसा है जैसे किसी चूल्हे की आंच पूरे शहर में फैल जाए।
एक और हैरान करने वाली बात यह है कि ये जेट्स सीधे रेखा में नहीं जा रहे। वे एक सर्पिल जैसी आकृति बनाते हुए आगे बढ़ रहे हैं। इसे जेट प्रीसेशन कहा जाता है। इसे समझने के लिए एक घूमते हुए लट्टू की कल्पना कीजिए। लट्टू घूमते हुए थोड़ा डगमगाता है और उसकी धुरी धीरे धीरे घूमती रहती है। ठीक उसी तरह, ब्लैक होल से निकलने वाले जेट्स भी समय के साथ अपनी दिशा बदलते रहते हैं। यह पहली बार है जब किसी डिस्क आकार की आकाशगंगा में इतने बड़े पैमाने पर ऐसे घूमते हुए जेट्स देखे गए हैं।
इस पूरी प्रक्रिया का असर सिर्फ सुंदर तस्वीरों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर आकाशगंगा के भविष्य पर पड़ता है। VV 340a से हर साल इतनी गैस बाहर निकाली जा रही है, जिसका वजन हमारी सूर्य जैसी उन्नीस तारों के बराबर है। यही गैस नई तारों के जन्म का कच्चा माल होती है। जब ब्लैक होल इस गैस को गर्म करके बाहर फेंक देता है, तो आकाशगंगा में नए तारों का बनना धीमा हो सकता है या लगभग रुक भी सकता है।
इस तरह ब्लैक होल सिर्फ एक विनाशकारी शक्ति नहीं है, बल्कि वह एक नियामक भी है। वह तय करता है कि आकाशगंगा कब और कैसे बढ़ेगी, उसमें कितनी तेजी से तारे बनेंगे और उसका भविष्य कैसा होगा। यह विचार हमें ब्रह्मांड को एक जुड़ी हुई व्यवस्था के रूप में देखने पर मजबूर करता है, जहां एक केंद्र में मौजूद अदृश्य वस्तु लाखों तारों के जीवन को प्रभावित कर सकती है।
इस खोज का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह हमें दिखाती है कि ब्रह्मांड स्थिर नहीं है। वह लगातार बदल रहा है, बह रहा है और खुद को ढाल रहा है। James Webb जैसे उपकरण हमें यह समझने में मदद कर रहे हैं कि हम सिर्फ सितारों को नहीं देख रहे, बल्कि समय, ऊर्जा और प्रकृति के गहरे नियमों को देख रहे हैं। VV 340a की यह घटना हमें याद दिलाती है कि हम एक ऐसे ब्रह्मांड का हिस्सा हैं, जो हमारी कल्पना से कहीं ज्यादा शक्तिशाली, जटिल और रहस्यमय है।




