जहरीले केमिकल, आग, धमाका: AI से बढ़ा लैब रिस्क

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI अब सिर्फ मोबाइल, सोशल मीडिया या ऑफिस के काम तक सीमित नहीं रहा है। बीते कुछ सालों में इसका दायरा तेजी से वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं तक पहुंचा है। दुनिया भर की रिसर्च लैब्स में अब AI का इस्तेमाल प्रयोगों की योजना बनाने, केमिकल प्रक्रियाओं को समझने और नए वैज्ञानिक आइडिया सुझाने के लिए किया जा रहा है। यह तकनीक काम को तेज़ बनाती है और रिसर्च की दिशा बदलने की क्षमता रखती है। लेकिन इसी तेजी के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है कि क्या AI प्रयोगशालाओं के लिए सुरक्षित है। वैज्ञानिकों की एक नई रिसर्च ने इसी सवाल को गंभीर चेतावनी के रूप में सामने रखा है। उनका कहना है कि मौजूदा AI मॉडल प्रयोगशालाओं में खतरनाक गलतियां कर सकते हैं, जिनका नतीजा आग, विस्फोट या ज़हरीले रसायनों से जुड़ी दुर्घटनाओं के रूप में सामने आ सकता है।

वैज्ञानिकों की चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि AI अक्सर बहुत आत्मविश्वास के साथ जवाब देता है। उसकी भाषा ऐसी होती है कि सामने वाला इंसान यह मान लेता है कि सिस्टम को पूरी समझ है। लेकिन असलियत यह है कि AI कई बार बुनियादी सुरक्षा नियमों को नजरअंदाज कर देता है। प्रयोगशालाओं में जहां हर कदम पर सावधानी जरूरी होती है, वहां यह लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है। यही वजह है कि अब AI को लेकर उत्साह के साथ साथ डर भी पैदा हो रहा है।

प्रयोगशालाओं में पहले हो चुकी दुर्घटनाएं और खतरे की पृष्ठभूमि

यह समझना जरूरी है कि वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं वैसे ही पूरी तरह सुरक्षित जगह नहीं होतीं। यहां रोज़ाना खतरनाक केमिकल, तेज़ गर्मी, उच्च दबाव और संवेदनशील उपकरणों के साथ काम होता है। इतिहास में कई ऐसे मामले दर्ज हैं जब छोटी सी चूक ने बड़ी दुर्घटना का रूप ले लिया। कहीं ज़हरीले केमिकल त्वचा के संपर्क में आ गए, कहीं विस्फोट में हाथ या आंखों को नुकसान पहुंचा। ऐसे हादसे भले ही रोज़ न होते हों, लेकिन जब होते हैं तो उनका असर जिंदगी भर रहता है।

इसी संदर्भ में वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर ऐसे माहौल में AI की गलत सलाह जुड़ जाए, तो खतरा कई गुना बढ़ सकता है। AI को न दर्द महसूस होता है, न डर, और न ही उसे यह एहसास होता है कि सामने खड़ा इंसान उसकी सलाह पर भरोसा करके जान जोखिम में डाल सकता है। इंसान अपनी सीमाओं को समझता है, लेकिन AI हर सवाल का जवाब देने की कोशिश करता है, चाहे उसे पूरा ज्ञान हो या नहीं। प्रयोगशालाओं में यही रवैया सबसे बड़ा जोखिम बन सकता है।

AI मॉडल कैसे काम करते हैं और कहां चूक जाते हैं

वैज्ञानिक बताते हैं कि आज इस्तेमाल हो रहे ज्यादातर बड़े AI मॉडल जनरल पर्पज के लिए बनाए गए हैं। इन्हें ईमेल लिखने, रिपोर्ट सुधारने, जानकारी का सार निकालने और सवालों के जवाब देने के लिए ट्रेन किया गया है। इनका मकसद भाषा को समझना और भाषा की नकल करना होता है। लेकिन केमिस्ट्री या लैब सेफ्टी जैसी चीजें सिर्फ भाषा का मामला नहीं हैं, ये अनुभव, प्रशिक्षण और व्यावहारिक समझ पर आधारित होती हैं।

AI की एक बड़ी कमजोरी यह है कि वह यह नहीं कहता कि उसे जानकारी नहीं है। अगर उससे ऐसा सवाल पूछ लिया जाए, जिसका सही जवाब देने के लिए जरूरी डेटा या संदर्भ मौजूद न हो, तब भी वह अनुमान लगाकर जवाब दे देता है। आम जिंदगी में यह परेशानी का कारण बन सकता है, लेकिन प्रयोगशालाओं में यही आदत खतरनाक हो जाती है। उदाहरण के तौर पर, अगर कोई रसायन शरीर पर गिर जाए तो उसका सही इलाज क्या है, इस सवाल पर AI कभी कभी गलत नियमों को मिला देता है और गलत सलाह दे बैठता है। यही वजह है कि वैज्ञानिक AI को फिलहाल प्रयोगशाला में अकेले फैसले लेने लायक नहीं मानते।

19 AI मॉडल की टेस्टिंग और चौंकाने वाले नतीजे

इन खतरों को आंकड़ों में समझने के लिए वैज्ञानिकों ने एक खास टेस्ट तैयार किया, जिसे LabSafety Bench नाम दिया गया। इस टेस्ट में सैकड़ों सवाल और प्रयोगशाला से जुड़े दृश्य शामिल किए गए। कुल 19 अलग-अलग आधुनिक AI मॉडल को इस पर परखा गया। मकसद यह देखना था कि AI कितनी सही तरीके से खतरों को पहचान पाता है और उनसे बचाव की सलाह दे पाता है या नहीं।

नतीजे चौंकाने वाले थे। कोई भी AI मॉडल ऐसा नहीं था जो सभी खतरों को पहचान सके। कुछ मॉडल तो लगभग अनुमान के आधार पर जवाब दे रहे थे। यहां तक कि सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले मॉडल भी कुल मिलाकर पूरी तरह भरोसेमंद नहीं निकले। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर किसी सिस्टम की सटीकता 70 प्रतिशत से कम हो, तो उसे प्रयोगशाला जैसे हाई रिस्क माहौल में इस्तेमाल करना बेहद जोखिम भरा है। यही वजह है कि रिसर्च टीम ने साफ शब्दों में कहा कि मौजूदा AI मॉडल अभी प्रयोग डिजाइन करने के लिए तैयार नहीं हैं।

AI का भविष्य, इंसानी भूमिका और भरोसे की सीमा

हालांकि वैज्ञानिक AI के भविष्य को लेकर पूरी तरह नकारात्मक भी नहीं हैं। उनका मानना है कि आने वाले समय में AI विज्ञान को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है। कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि AI की तुलना अगर अनुभवहीन रिसर्च छात्रों से की जाए, तो संभव है कि AI कई मामलों में उनसे बेहतर साबित हो। लेकिन इसके साथ एक शर्त जुड़ी है, और वह है इंसानी निगरानी।

AI कंपनियों का भी यही कहना है कि AI को सहायक की भूमिका में इस्तेमाल किया जाना चाहिए, न कि अंतिम निर्णय लेने वाले के रूप में। उदाहरण के तौर पर OpenAI का कहना है कि उनके नए मॉडल पहले से ज्यादा बेहतर तर्क और गलती पकड़ने की क्षमता रखते हैं, लेकिन सुरक्षा से जुड़े फैसलों की जिम्मेदारी इंसानों और मौजूदा सेफ्टी सिस्टम पर ही रहनी चाहिए।

विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि सबसे बड़ा खतरा AI की गलती नहीं, बल्कि इंसानों का उस पर जरूरत से ज्यादा भरोसा है। जैसे ही इंसान सतर्क रहना छोड़ देता है और सोचता है कि AI सब संभाल लेगा, वहीं से समस्या शुरू होती है। फिलहाल वैज्ञानिकों की आम राय यही है कि AI को प्रयोगशालाओं में मददगार टूल की तरह इस्तेमाल किया जाए, न कि वैज्ञानिक के विकल्प के रूप में। विज्ञान में तरक्की जरूरी है, लेकिन सुरक्षा से समझौता किए बिना।

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न्यूज़ डेस्क

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