
चीन से जारी ताजा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार देश की जनसंख्या में गिरावट का सिलसिला लगातार चौथे वर्ष भी जारी रहा। वर्ष 2025 में चीन में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या घटकर लगभग 79.2 लाख रह गई, जो 2024 में दर्ज 95.4 लाख जन्मों की तुलना में काफी कम है। इसके विपरीत इसी अवधि में मौतों की संख्या बढ़कर करीब 1.13 करोड़ तक पहुंच गई। जन्म और मृत्यु के इस अंतर के कारण कुल जनसंख्या में और कमी दर्ज की गई। प्रति हजार आबादी पर जन्म का अनुपात घटकर 5.63 रह गया, जिसे 1949 के बाद का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। इन आंकड़ों ने चीन में गहराते जनसांख्यिकीय संकट की तस्वीर को और स्पष्ट कर दिया है।
नीतिगत कोशिशों के बावजूद संतानोत्पत्ति में सुधार नहीं
चीन में बीते कुछ वर्षों के दौरान जन्मदर बढ़ाने के लिए कई तरह के नीतिगत और प्रशासनिक उपाय किए गए। विवाह और संतान को सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्रीय दायित्व के रूप में प्रस्तुत किया गया। नए विवाहित जोड़ों को परिवार नियोजन से जुड़ी सलाह दी गई और स्थानीय स्तर पर लोगों को बच्चों के लिए प्रेरित करने के प्रयास तेज किए गए। कुछ नीतिगत फैसलों के जरिए गर्भनिरोधक साधनों से जुड़े नियमों में बदलाव भी किया गया। हालांकि इन प्रयासों का असर सीमित ही रहा। बड़ी संख्या में युवाओं ने इन उपायों को अपनी निजी जिंदगी से जोड़कर नहीं देखा और परिवार बढ़ाने के फैसले को टालते रहे। नतीजतन सरकारी कोशिशों और वास्तविक सामाजिक व्यवहार के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई दिया।
आर्थिक हालात और महंगी परवरिश बना बड़ा कारण
जन्मदर में गिरावट के पीछे आर्थिक दबाव को एक प्रमुख वजह माना जा रहा है। चीन में हाल के वर्षों में आर्थिक रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी हुई है और रोजगार को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। रियल एस्टेट संकट, युवाओं में बेरोजगारी और आय की अस्थिरता ने परिवार शुरू करने को लेकर चिंता को और गहरा किया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और बच्चों की देखभाल से जुड़े खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में कई युवा यह मानते हैं कि मौजूदा परिस्थितियों में बच्चे की परवरिश आर्थिक रूप से भारी बोझ बन सकती है। सामाजिक सुरक्षा तंत्र को कमजोर समझे जाने के कारण भी लोग भविष्य को लेकर सतर्क रवैया अपना रहे हैं, जिसका सीधा असर जन्मदर पर पड़ रहा है।
कामकाजी आबादी घटने से बढ़ती बुजुर्गों की निर्भरता
चीन की जनसंख्या संरचना तेजी से बदल रही है। कामकाजी उम्र के लोगों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है, जबकि बुजुर्ग आबादी का अनुपात तेज़ी से बढ़ रहा है। अनुमान है कि आने वाले एक दशक में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या कई करोड़ तक पहुंच सकती है। इससे पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ने की आशंका है। सीमित कार्यबल के भरोसे बढ़ती सेवानिवृत्त आबादी को सहारा देना एक बड़ी आर्थिक चुनौती के रूप में उभर रहा है। इसी कारण सेवानिवृत्ति की उम्र में धीरे-धीरे बढ़ोतरी की दिशा में कदम उठाए गए हैं, लेकिन इसके बावजूद यह उम्र कई अन्य देशों की तुलना में अभी भी कम मानी जाती है। युवाओं में पेंशन फंड में योगदान को लेकर भी झिझक देखी जा रही है, जिससे दीर्घकालिक वित्तीय संतुलन पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
विवाह से दूरी और जनसांख्यिकीय संकट की गहराई
चीन में सिर्फ जन्मदर ही नहीं, बल्कि विवाह को लेकर भी सामाजिक रुझान बदलते दिख रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में युवा शादी को टाल रहे हैं या इसे प्राथमिकता नहीं दे रहे। सामाजिक मेलजोल और विवाह को प्रोत्साहित करने वाले कार्यक्रमों के बावजूद लोगों की भागीदारी सीमित रही है। कई मामलों में देखा गया है कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं ऐसे प्रयासों में कम रुचि दिखाती हैं। यह प्रवृत्ति संकेत देती है कि परिवार और विवाह को लेकर सोच में गहरा बदलाव आ चुका है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब किसी देश की प्रजनन दर एक निश्चित सीमा से नीचे चली जाती है और जनसंख्या घटने लगती है, तो उसे दोबारा बढ़ाना बेहद कठिन हो जाता है। मौजूदा हालात बताते हैं कि चीन अब ऐसे जनसांख्यिकीय मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां सिर्फ नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता, सामाजिक सुरक्षा और जीवनशैली से जुड़े व्यापक सुधारों के बिना इस संकट से निकलना आसान नहीं होगा।




