जनवरी में भी जारी विदेशी निवेशकों की बिकवाली

जनवरी महीने में भी भारतीय शेयर बाजार पर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की बिकवाली का दबाव लगातार बना रहा। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, महीने के पहले सोलह दिनों में ही एफपीआई भारतीय इक्विटी बाजार से 22,530 करोड़ रुपये से अधिक की निकासी कर चुके हैं। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब 2025 में पहले ही विदेशी निवेशकों ने 1.66 लाख करोड़ रुपये की भारी बिकवाली की थी। बाजार विशेषज्ञ मानते हैं कि यह ट्रेंड केवल तात्कालिक कारणों से नहीं, बल्कि वैश्विक और घरेलू दोनों स्तरों पर बने ढांचागत दबावों का नतीजा है। रुपये की कमजोरी, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और निवेशकों की बदलती प्राथमिकताएं इस तस्वीर को और गंभीर बना रही हैं।

NSDL के आंकड़े

नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड के आंकड़ों के अनुसार, एक जनवरी से सोलह जनवरी के बीच विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से कुल 22,530 करोड़ रुपये निकाले। साप्ताहिक स्तर पर देखें तो यह बिकवाली चार कारोबारी सत्रों में फैली हुई रही। बारह जनवरी को 3,686.99 करोड़ रुपये की निकासी हुई, तेरह जनवरी को 3,108.35 करोड़ रुपये और चौदह जनवरी को 429.85 करोड़ रुपये के शेयर बेचे गए। इसके बाद सोलह जनवरी को बिकवाली की रफ्तार फिर तेज हुई और 3,515.33 करोड़ रुपये बाजार से बाहर चले गए। इस दौरान घरेलू संस्थागत निवेशकों ने करीब 34,076 करोड़ रुपये का निवेश किया, लेकिन इसके बावजूद बाजार पर विदेशी बिकवाली का दबाव साफ नजर आया।

वैश्विक कारण, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और डॉलर की मजबूती

न्यूज एजेंसी पीटीआई के हवाले से बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में लगातार बढ़ोतरी और डॉलर की मजबूती ने विकसित बाजारों में जोखिम समायोजित रिटर्न को अधिक आकर्षक बना दिया है। सेंट्रिसिटी वेल्थटेक के इक्विटी हेड और फाउंडिंग पार्टनर सचिन जसुजा के अनुसार, ऐसे माहौल में उभरते बाजारों से पूंजी निकलकर अमेरिका जैसे सुरक्षित और स्थिर बाजारों की ओर जा रही है। इसके साथ ही भू राजनीतिक तनाव, वैश्विक व्यापार को लेकर अनिश्चितता और अमेरिकी टैरिफ बढ़ने की आशंका ने निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को सीमित कर दिया है। इन सभी कारकों का सीधा असर भारतीय बाजार में एफपीआई की रणनीति पर दिख रहा है।

AI थीम में भारत की कमजोर भागीदारी और एशिया से तुलना

भारत का प्रदर्शन कई एशियाई बाजारों की तुलना में कमजोर रहा है। कोरिया, ताइवान, जापान और चीन जैसे बाजारों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर थीम से सीधा फायदा मिला। इन देशों की टेक कंपनियों ने मजबूत रिटर्न दिए और वहां के बाजार अमेरिका के बराबर या उससे बेहतर प्रदर्शन कर पाए। इसके उलट भारत के पास फिलहाल ऐसी कोई बड़ी एआई आधारित ग्रोथ स्टोरी नहीं दिखी, जो वैश्विक निवेशकों को आक्रामक खरीदारी के लिए प्रेरित कर सके। एआई निवेश चक्र के दौरान भारत की स्थिर ग्रोथ स्टोरी कुछ समय के लिए दब गई, जिसका असर एफआईआई सेंटिमेंट पर साफ दिखा।

रुपये की कमजोरी, वैल्यूएशन चिंता और आगे की राह

रुपये में लगातार कमजोरी भी विदेशी निवेशकों के लिए चिंता का बड़ा कारण बनी हुई है। 2025 के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपये में करीब पांच प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जिसमें एफपीआई की लगातार बिकवाली की अहम भूमिका रही। कमजोर करेंसी का मतलब यह है कि विदेशी निवेशकों को अपने डॉलर रिटर्न को लेकर अतिरिक्त जोखिम उठाना पड़ता है। इसके साथ ही कुछ सेक्टर्स में ऊंचे वैल्यूएशन और अर्निंग्स सीजन से मिले जुले संकेतों ने भी निवेशकों को मुनाफावसूली के लिए प्रेरित किया। जब तक बाजार को मजबूती देने वाला कोई साफ और बड़ा पॉजिटिव ट्रिगर सामने नहीं आता, तब तक एफपीआई की बिकवाली का यह ट्रेंड जारी रह सकता है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि एआई हाइप के ठंडा पड़ने और भारत की छह से सात प्रतिशत की स्थिर आर्थिक वृद्धि दोबारा फोकस में आने पर विदेशी निवेशकों की धारणा में धीरे धीरे बदलाव आ सकता है।

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न्यूज़ डेस्क

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