
केंद्रीय बैंक एक बार फिर सोने पर बड़ा दांव लगा रहे हैं। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की रणनीति के बीच केंद्रीय बैंकों के स्वर्ण भंडार अब लगभग 50 वर्षों के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए हैं। आखिर क्यों दुनिया के देश तेजी से सोना खरीद रहे हैं?
सोना हमेशा से सुरक्षित निवेश का प्रतीक माना जाता रहा है। जब दुनिया आर्थिक संकट, युद्ध या वित्तीय अस्थिरता का सामना करती है, तो निवेशकों के साथ-साथ केंद्रीय बैंक भी अपने भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाने लगते हैं।पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने कई बड़े संकट देखे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, महंगाई, ऊंची ब्याज दरें और वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती ने देशों को अपनी वित्तीय रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया है।विशेषज्ञों के अनुसार, कई देश अब अपने विदेशी मुद्रा भंडार को केवल अमेरिकी डॉलर पर निर्भर नहीं रखना चाहते। इसी वजह से वे सोने की खरीद बढ़ा रहे हैं।
सोना ऐसी संपत्ति है, जिसकी कीमत लंबे समय में अपेक्षाकृत स्थिर रहती है और संकट के दौर में यह सुरक्षा कवच का काम करता है।केंद्रीय बैंकों द्वारा लगातार की जा रही खरीदारी ने वैश्विक गोल्ड डिमांड को भी मजबूती दी है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में लगातार मजबूती देखने को मिली है।भारत भी इस दौड़ में पीछे नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक ने पिछले कुछ वर्षों में अपने स्वर्ण भंडार में लगातार इजाफा किया है। इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा भंडार को और मजबूत बनाना तथा वैश्विक आर्थिक जोखिमों के बीच वित्तीय स्थिरता बनाए रखना है।
जानकारों का मानना है कि यदि वैश्विक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता आगे भी बनी रहती है, तो केंद्रीय बैंकों की सोने की खरीदारी जारी रह सकती है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।
दुनिया के केंद्रीय बैंकों का रिकॉर्ड स्तर पर सोना खरीदना इस बात का संकेत है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था अभी भी अनिश्चितताओं से घिरी हुई है। ऐसे माहौल में सोना केवल एक कीमती धातु नहीं, बल्कि देशों की आर्थिक सुरक्षा और वित्तीय भरोसे का मजबूत आधार बनकर उभर रहा है।




